13. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसका धर्म है कि वह स्वयं जिए और दूसरों को भी जीने दे। वह अपने सुख-दुख के साथ दूसरों के सुख-दुख की ओर भी ध्यान दे। अपने स्वार्थ को छोड़कर दूसरों के हित की भी सोचे। अपना स्वार्थ सिद्ध करना मानवता नहीं है। ‘परहित’ ही सच्ची मानवता है। यही सच्चा धर्म है। मनुष्य अपनी क्षमता या सामर्थ्य के अनुसार परहित कर सकता है। वह मन से, धन से या तन से अथवा तीनों से दूसरों की भलाई कर सकता है। दूसरों के प्रति सच्ची सहानुभूति रखना भी परहित है। किसी को संकट से बचाना, किसी को कुमार्ग से हटाना, किसी दुखी और निराश व्यक्ति को सांत्वना देना भी परहित के ही अंतर्गत आता है। भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की तपस्या में बाधा डालने वाले राक्षसों का संहार किया। ईसा मसीह ने लोगों का उत्थान किया, सम्राट अशोक ने स्थान-स्थान पर कुएँ, तालाब आदि खुदवाकर जनता का उपकार किया। यही मानवता का प्रमुख धर्म है। ‘परहित’ के अंतर्गत आता है:
(1) दूसरों के प्रति सच्ची सहानुभूति रखना
(2) संकट में छोड़ देना
(3) कुमार्ग पर भेजना
(4) अपने स्वार्थ को नहीं छोड़ना
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कारण: गद्यांश में स्पष्ट लिखा है: “दूसरों के प्रति सच्ची सहानुभूति रखना भी परहित है।” तथा “किसी को संकट से बचाना, किसी को कुमार्ग से हटाना, किसी दुखी और निराश व्यक्ति को सांत्वना देना भी परहित के ही अंतर्गत आता है।” विकल्प (1) सीधे गद्यांश से मेल खाता है।
